करौंदा एक बहुत सहिष्णु पौधा है | यह उष्ण तथा उपोष्ण
जलवायु में उगाया जा सकता है | लेकिन अधिक बरसात और जलमग्न भूमि इसके लिए
नुकसानदायक है |
भूमि :-
करौंदा अनेक प्रकार की भूमि में तथा कम उपजाऊ भूमि में भी
उगाया जा सकता है लेकिन अच्छी बढवार और उपज (पैदावार) के लिए अच्छी भूमि होना
आवश्यक है |
प्रवर्धन :-
करौंदे का प्रवर्धन बीज व वानस्पतिक तरीकों,जैके
कटिंग,इनारचिंग तथा लेयरिंग से कर सकते है |
फासला :-
फरवरी-मार्च व सितम्बर-अक्टूबर के महीने में 60 गुना 60
गुना 60 गुना सेटीमीटर के गड्ढे 3 गुना 3 मीटर की दूरी पर तैयार कर पौधे लगाने
चाहिए |
काट-छांट :-
पौधा लगते समय इसे किसी बांस का सहारा दें ताकि इसकी बढ़वार
सीधी रहे | समय-समय पर अवांछित शाखाओं को निकालते रहें | फलित पौधे को बहुधा कटाई
की आवश्यकता नहीं होती फिर भ अच्छे आकर देने के लिए फालतू टहनियों की काट-छांट
आवश्यक हो जाती है | रोगग्रस्त शाखाओं को निकाल दें | पुरानी शाखाओं में बदलने के
लिए कटाई-छंटाई करते रहे |
बीच की फसल :-
पौधा लगाने के पहले वर्ष खरपतवार काफी समस्या पैदा कर सकते
है | जिन्हें निराई-गुड़ाई द्वारा निकालते रहना चाहिए | करौंदे की लगातार फसल में
पहले 2 वर्ष तक वर्षा में तक वर्षा में उगाई जाने वाली सब्जियों की काश्त की जा
सकती है |
खाद एवं उर्वरक :-
करौंदा के पौधे को 15-20 किलो गोबर की गली-सड़ी खाद प्रति
पौधा प्रति वर्ष दें | इसे वर्षा ऋतु के आगमन पर दल दें वर्ना पौधों की बढ़वार
कमजोर पड़ जाएगी |
सिंचाई:-
करौंदा प्राय; कम बढ़ने वाला पौधा है | एक बार भूमि में
अच्छी तरह लग जाने पर इसे पानी की आवश्यकता नहीं रहती है |
फलन:-
करौंदा में तृतीय वर्ष से फूल व फल आने शुरू हो जाते है तथा
फरवरी के महीने में फूल आते है और फल अगस्त के महीने में पककर तैयार हो जाता है | हालांकि
कच्चे फल मई मास में ही मिलने शुरू हो जाते है |
फलों की तुड़ाई:-
कच्चे व पके फलों की तुड़ाई की जाती है | एक ही समय पर सभी
फल तोडना असम्भव है | इसे दो या तीन बार करते है फलों का रंग बदलना ही फलों की
परिपक्वता की निशानी है | सामान्यत: 4-5 किलो फल प्रति पौधा लिए जा सकते है |
करौंदा की खेती के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए विडियो के लिंक पर क्लिक करें |
फालसा की कोई भी निश्चित किस्म
उपलब्ध नहीं है | दोनों प्रकार की किस्में हिसार व दक्षिण पश्चिम हरियाणा क्षेत्र
के लिए मान्य हैं बौनी किस्म की जाति अधिक उपज देने वाली है और इसके फल भी अधिक रस
वाले होते है |
लगाने (रोपने) का समय:- नर्सरी
में लगे हुए पौधे,जिमें सुप्तावस्था में आने से फ्ल्ले काफी वृद्धि हो चुकी
हो,फरवरी के महीने में खेत में रोप देने चाहिए | इसका मुख्य लाभ है | जड़ों के साथ
मिटटी की जरूरत का न होना | वर्षा के मौसम में रोपते समय गाछी का होना जरुरी है |
मिटटी:-
शुष्क क्षेत्रों में जहाँ पर मिटटी उपजाऊ नहीं है तथा जिसमें अन्य फलदार पौधे नहीं
उगाए जा सकते हों,वहां उपयुक्त है |
प्रवर्धन:-
इसके पौधे बीज द्वारा तैयार करते हैं अंकुरित पौधे शुद्ध किस्म के होते है नर्सरी
में उगाने के लिए ताजा बीजों का चुनाव करना चाहिए | यदि हम बीज का खुले में
भण्डारण करते हैं तो उसके उगने की क्षमता 90-100 दिन तक रहती है | और यदि शीतगृह
में रहते है तो उसके उगने की क्षमता 6 महीने तक रहती है | बीज को उगने के लिए
15-20 दिन और रोपित करने के लिए 3-4 महीने
की आवश्यकता होती है |
फालसा ;-
पौधों को रोपते समय कतार से कतार एवं पौधे से पौधे का 1.5 से 2.0 मीटर का फासला
उचित माना गया है |
कटाई-छंटाई:- फालसा
की खेती में कटाई-छंटाई का विशेष महत्व है | लम्बी किस्म के लिए कटाई-छंटाई जमीन
से 0.9-1.2 मीटर ऊंचाई पर एवं बौनी किस्म के लिए जमीन से 40-60 सेटीमीटर की ऊंचाई
पर उचित है दिसम्बर-जनवरी के महीनों के जब पौधा सुशुप्त अवस्था में होता है |
सिंचाई:-
फालसा में प्रथम सिंचाई,खाद डालने के बाद,फरवरी के दूसरे-तीसरे सप्ताह में की जाती
है | मार्च-अप्रैल में सिंचाई 20-25 दिन के अन्तर पर करनी चाहिए और मई के महीने
में इस अन्तर को घटाकर 15-20 दिन का देना चाहिए |
कीट नियंत्रण:-
पत्ते खाने वाले भुंडीया
बालों वाली सूण्डी
रोग नियंत्रण :-
भूरे धब्बों का रोग:- इस रोग के
कारण वर्षा के मौसम में पत्ते पूर्ण वृद्धि से पहले ही गिर जाते हैं | प्रारम्भ
में पत्तों पर छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं जो पत्तियों की दोनों सतह पर दिखाई देते
है जो बाद में आकार में बड़े दिखाई पड़ते है |
नियंत्रण एवं सावधानियां :- रोकथाम
के लिए मैंकोजेब 0.3 प्रतिशत के घोल का छिडकाव करें |
रतुआ :- हल्के भूरे रंग के फफोले
पत्तियों की निचली सतह पर बनते है | रोग से प्रभावित पत्तियां सूखकर गिरने लगाती
हैं | यह रोग दस्तुरेल्ला ग्रेवी नामक कवक द्वारा होता है |
इसकी रोकथाम के लिए मैंकोजेब के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव 15 दिन के अन्तर
पर करें |
फालसा की खेती के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए विडियो के लिंक पर क्लिक करें |
शहतूत की कोई विशेष किस्म
नहीं है | कुछ लोकल किस्में हैं जोकि सफ़ेद और काली जाति की हैं |
प्रवर्धन विधि :-
इसके पौधे,कमल और चश्मा चढ़ाकर तैयार किए जाते है | पौधों की
4-5 आंख की कलमें नर्सरी में लगाई जाती है और जुलाई से अगस्त तक चश्मा चढ़ाया जाता
है |
मिटटी :-
इसे सभी प्रकार की मिटटी
में लगाया जा सकता है इसे विशेषकर चकनी दोमट या रेतीली दोमट भूमि में लगाना चाहिए
|
पौध लगाना :-
अक्टूबर-नवम्बर के महीने 60 गुना 60 गुना 60 गुना सेटीमीटर के
गड्ढे 6 गुना 6 मीटर की दूरी पर तैयार करने चाहिएं | गढ्ढे को कुछ दिन खाली रख कर
उसमें 2-3 टोकरे गोबर की खाद मिलाकर मिटटी भर देनी चाहिए |
काट-छांट :-
शहतूत में काट-छांट बहुत
जरूरी है | अच्छी पैदावार के लिए सालाना गहरी कटाई करनी चाहिए |
सिंचाई :-
मार्च से जून तक 3-4 बार
सिंचाई अवश्य करनी चाहिए |
उर्वरक :-
50-80 किलोग्राम गोबर की
खाद दिसम्बर के महीने में देनी चाहिए |
शहतूतकी खेती के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए विडियो के लिंक पर क्लिक करें |
भारत में औषधीय पौधों की जानकारी चिकित्सा के क्षेत्र में वैदिक काल से ही परम्परागत रूप से चली आ रही है | औषधीय फसलों का उपयोग विभिन्न बीमारियों के ईलाज में होता है साथ ही इनसे आर्थिक लाभ अर्जित किया जा सकता है | विश्व की 65 से 80 प्रतिशत आबादी अपनी स्वास्थ्य रक्षा हेतु प्राकृतिक/हर्बल उत्पादों पर झुकाव एवं निर्भरता रखती है | सौन्दर्य प्रसाधन तथा खाद्य पदार्थों में इनका उपयोग होता है | विश्व व्यापार से हर्बल उत्पादों के भाग में बढ़ोतरी के कारण औषधीय फसलों की खेती के लिए लोगों में झुकाव बढ़ा है | वनों से प्राप्त वनौषधियों के लगातार दोहन के साथ-साथ राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मांग बढ़ती जा रही है तथा प्राकृतिक स्त्रोतों की उपलब्धता कम होती जा रही है | इस सम्पदा के विदोहन को रोकने के लिए संरक्षण,संवर्धन एवं इनकी व्यावसायिक खेती करके राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय स्तर पर मांग की आपूर्ति की जा सकती है | इस व्यावसायिक दृष्टिकोण को ध्यान रखते हुए औषधीय पौधों के उत्पादन की उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी एवं प्रंसस्करण संबधित संक्षिप्त जानकारी किसानों को दी जा रही है |
सर्पगंधा फसल का उपयोग व
खेती की विधि:- सर्पगंधा की जड़ों का
उपयोग औषधी के रूप में मस्तिष्क संबंधी रोगों,मिरगी,उच्च रक्तचाप तथा अनिद्रा में
होता है |
बलुई दोमट मिटटी इसके लिए
अच्छी मानी जाती है | मई का माह नर्सरी लगाने हेतु व जुलाई माह में खेतों में पौध
रोपने के लिए उपयुक्त रहता है | बुवाई/रोपाई हेतु प्रति हेक्टेयर 5 से 7 किलोग्राम
बीज या 100 किलोग्राम ताज़ी जड़ों की आवश्यकता
होती है | प्रति हैक्टर 10 से 12 क्विंटल सूखी जड़े प्राप्त होती है |
सर्पगंधा की खेती के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए विडियो के लिंक पर क्लिक करें |
Video link: https://www.youtube.com/watch?v=dEPRdaANBOI
किसान भाइयों
और बहनों नमस्कार ! किसान संचार जीरकपुर निकट चंडीगढ़ की टीम आज आपके लिए लेकर आयी
है रेडियो वार्ता “ऐसे करें लौकी की जैविक खेती”किसान भाइयों ! आज हम किसान संचार जीरकपुर निकट
चंडीगढ़ के सौजन्य से आपको बताने जा रहे हैं कि आप भी रसायनिक उर्वरकों तथा रसायनिक
कीट नाशियों पर से अपनी निर्भरता को कम करते हुए स्थानीय और विशेषकर स्वयं तैयार
किये जैविक खादों व जैविक कीट नाशियों का अधिक से अधिक उपयोग करके किस तरह जैविक
उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं | इसी क्रम में आज प्रस्तुत है लौकी की जैविक खेती
कैसे करें |लौकी एक बहुपयोगी फसल है इसके
कच्चे फलों से सब्जियां,जूस व विभिन्न प्रकार की मिठाइयां तैयार की जाती हैं |
सूखे फलों के खोल मछली पकड़ने के तैरने वाले जाल तैयार करने,तरह-तरह के बर्तन व वाद्ययंत्र
आदि बनाने में प्रयोग किये जाते हैं | कच्ची लौकी के गूदे में प्रचुर मात्रा में
रेशा रहित कार्बोहाइड्रेट मिलता है | लौकी के बीजों का तेल बालों के तेल में
प्रयोग किया जाता है |
लौकी की खेती मुख्य रूप से उत्तर
प्रदेश,पंजाब,गुजरात,आसाम,मेघालय और राजस्थान में की जाती है | वैसे सभी तरह की
मिटटी इसकी खेती के लिए उपयुक्त हैं किन्तु अधिक अम्लीय व क्षारीय मिटटी को छोड़कर रेतीली मिटटी सर्वोत्तम रहती
हैं जीवाश्म की पर्याप्त मात्रा के साथ-साथ जल निकास का भी उचित प्रबंध होना चाहिए
| मिटटी जनित रोगों से बचाव के लिए एक ही खेत में लगातार लौकी नहीं उगानी चाहिए |लौकी
की उचित बढ़वार तथा अधिक फल उत्पादन के लिए रात का तापमान 18 से 22 डिग्री सेल्सियस
तथा दिन का तापमान 30-35 डिग्री सेल्सियस तक अच्छा माना जाता है |
आप आगे बताई जा रही किस्मों में से सुविधा अनुसार किस्मों का चुनाव कर सकते
हैं |
उन्नत किस्में
:-
1.अरका बहार :- इसके कच्चे फल सीधे लम्बे,मध्यम आकार वाले लगभग 1
किलोग्राम वजनी व हरे होते हैं यह अधिक उपज देने वाली किस्म है |
3.क्ल्याणपुरहरी लम्बी :- यह किस्म भी गर्मी व बरसात दोनों मौसम के लिए उपयुक्त है
इसके कच्चे फल लम्बे व गहरे हरे रहते है औसत पैदावार 100 कुवंटल प्रति एकड़ है |
4.एन.डी.बी.जी-1 :- इसके कच्चे फल समान आकार के लम्बे व हल्के हरे तथा नीचे से कुछ मुड़े हुए
होते हैं यह बसंत कालीन या गर्मी के मौसम के लिए उपयुक्त है | औसत पैदावार 100
कुवंटल प्रति एकड़ देती हैं |
5.पूसा समर प्रोलीफिक राउंड :- यह किस्म भी गर्मी व बरसात दोनों मौसम
के लिए उपयुक्त है इसमें फल काफी लगते है
और बेलों की बढ़वार काफी होती है | कच्चे फल 15-18 सेटीमीटर घेरे के गोल व हरे होते
हैं |
6.पंजाब कोमल :- यह शीघ्र फल देने वाली किस्म है जो प्रति पौधा 10-12
फल देती है कच्चे फल का वजन 600 ग्राम रहता है | बोने के 70 दिन बाद फल देने लगती
है यह मोजेक रोग के प्रति सहनशील किस्म है |
7.पंजाब लौंग :- इसके कच्चे फल लम्बे कोमल हल्के हरे रंग के व सुंदर
होते हैं यह किस्म 180 कुवंटल प्रति एकड़ औसत उपज देती है |
8.पंजाब गोल :- इस किस्म के कच्चे फल सुंदर,गोल,कोमल व हरे रंग के होते
है यह पंजाब के लिए अच्छी किस्म है |
10.पूसा समर प्रोलीफिक लौंग :- इसके कच्चे फल लम्बे,एक समान,हल्के हरे
होते है यह गर्मी व बरसात दोनों मौसम के लिए उपयुक्त किस्म है | जो 125 कुवंटल
प्रति एकड़ उपज देती है |
11.पूसा मंजरी :- यह अधिक पैदावार देने वाली संकर किस्म है | इसके
कच्चे फल लम्बे, हल्के हरे,मुलायम व आकर्षक होते हैं यह बसंतकालीन बुवाई के लिए
उत्तम है |
12.पूसा मेघदूत :- यह भी अधिक पैदावार देने वाली संकर किस्म है जो
शीघ्र फल देने लगती है | यह बसंतकालीन व गर्मी की बुवाई के लिए अच्छी है | इसके
कच्चे फल लम्बे, हल्के हरे,मुलायम तथा आकर्षक होते हैं |
13.पूसा नवीन :- यह गर्मी व बरसात दोनों मौसम के लिए अच्छी है | शिवालिक
पहाड़ियों,बिहार व मध्य प्रदेश में बरसाती बुवाई के लिए भी अच्छी है | इसके कच्चे
फल सीधे,बेलनाकार व हरे होते है | फल की लम्बाई 1 फिट तथा वजन लगभग 850 ग्राम रहता
है |
भूमि की तैयारी :- बोने से 3-4 सप्ताह पहले खेत
में 20 टन कम्पोस्ट या गोबर की सड़ी खाद, 10 किलोग्राम नीम की खली व 15 किलो अरंडी
की खली प्रति एकड़ डालकर एक जुताई हेरो से,3 क्रास जुताई कल्टीवेटर से करके व पाटा
लगाकर खेत को समतल कर लें और फिर 2 से 2.5 मीटर के अंतर से 40-50 सेटीमीटर चौड़ी
नालियां खेत में बना लें |
बीज की मात्रा :- लौकी का 1.5 से 2 किलोग्राम
बीज प्रति एकड़ पर्याप्त रहता है |
बोने का समय :- बसंतकालीन फसल के लिए जनवरी,ग्रीष्म कालीन फसल के लिए फरवरी से मार्च तथा
वर्षा कालीन फसल के लिए जून से जुलाई तक समय बुवाई के लिए ठीक रहता है |
बोने की विधि :- बीज को 24 से 48 घंटे तक साफ पानी में डुबोयें | पानी में तैर जाने वाले
बीजों को न बोयें | पानी में बैठे बीजों को निकालकर फरेरा करने के बाद पहले बनायी
गयी 2 से 2.5 मीटर फासले वाली कतारों में 1 से 1.5 मीटर के फासले पर बीज बोयें
यानि पौधे से पौधे के बीच 1 से 1.5 मीटर
का अंतर रखकर बुवाई करें | ध्यान रखें कि गर्मी की फसल का बीज बरसाती फसल के लिए
उपयोग न करें |नदियों के किनारे कछारी मिटटी में 1 मीटर गहरी और 60 सेटीमीटर चौड़ी
नालियां बनाई जाती है | खुदाई करते समय ऊपरी आधी बालू का एक ढेर लगा लिया जाता है
| आधी बालू को खोदकर उससे नालियों को लगभग 30 सेटीमीटर तक भर देते है इन्ही
नालियों में 1 से 1.5 मीटर की दूरी पर छोटे-छोटे थाले बनाकर बसंतकालीन फसल के लिए जनवरी
में लौकी के बीज बोयें | दो नालियों के बीच 3 मीटर का फांसला रखना चाहिए | पौधो को
पाले से बचाने के लिए उत्तर पश्चिमी दिशा में फूस की बाड़ लगानी चाहिए |
उर्वरकों का प्रयोग :- बहुत अच्छा होगा यदि मिटटी परीक्षण के आधार पर
उर्वरकों की मात्रा दी जाय | यदि यह संभव नहीं है तो 20 किलोग्राम यूरिया,60
किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 16 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश को प्रति एकड़ की
दर से उन स्थानों पर समान मात्रा में मिटटी में मिला दें जहाँ लौकी के बीज बोने हैं | शेष बचे
20 किलोग्राम यूरिया में से 10 किलोग्राम मात्रा एक महीने की फसल होने पर तथा 10
किलोग्राम मात्रा फूल आने की अवस्था पर पौधों की जड़ों के आस-पास डाल कर हल्की
सिंचाई व निराई-गुड़ाई कर दें | तथा जड़ों पर मिटटी चढ़ा दें |
सिंचाई :- बसंतकालीन बोयी गयी फसल में प्रति सप्ताह सिंचाई जरूरी है लेकिन बरसात के
मौसम की फसल में सिंचाई वर्षा को देखते हुए ही करनी चाहिए | हाँ गर्मी में बोयी
गयी फसल में 8 -9 दिन के अन्तर से सिंचाई करें |
खरपतवार नियंत्रण :- फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना भी आवश्यक है
इसके लिए फसल में 3 से 4 बार हल्की निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को न पनपने दें तथा
बेलों की जड़ों पर मिटटी चढ़ाये |
कीट नियंत्रण :-
लालड़ी :- इस कीट के प्रोढ़ पीले रंग के और चमकीले होते हैं तथा इसकी सुंडियां (लट ) क्रीम
रंग की होती है | लौकी फसल के पौधों में 2 पत्तियां बनते ही इसकी प्रौढ़ सुंडियां
पत्तों में गोल सुराख करती है | ये सुंडियां जमीन के भीतर लौकी की जड़ों को काट
देती हैं जिससे पूरा पौधा सूख जाता है | मार्च से अगस्त माह तक यह कीट भारी नुकसान
करता है |तो लीजिये ऊपर बताये गये सभी कीटों से अपनी लौकी फसल की रक्षा के लिए
स्वयं तैयार कीजिए जैविक नुस्खा और इस
नुस्खे का प्रभावित फसल पर छिड़काव करके कीटों का नियंत्रण करें तथा लौकी का जहर
रहित जैविक व पौष्टिक उत्पादन पायें |
जैविक नुस्खा व
उसकी प्रयोग विधि इस प्रकार है |
ताम्बे के एक बड़े बर्तन में 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गौमूत्र व 5 किलोग्राम
धतूरा की पत्तियों को तब तक उबाले जब तक गौमूत्र की मात्रा आधी रह जाय अब इसे आंच
से उतार कर ठंडा करके छान लें | तथा छने हुए तरल मिश्रण की 3 लीटर मात्रा प्रति 15
लीटर पानी की दर से लौकी की कीट प्रभावित फसल पर इस तरह छिड़के जिससे पौधों के सभी
भाग अच्छी तरह भीग जाएँ | 12 से 15 दिन के
अंतर पर इस मिश्रण का छिड़काव करते रहें | इस मिश्रण के छिड़काव से कीट नियंत्रण के
साथ-साथ पौधों को पोषण भी मिलता है साथ ही मृदुरोमिल फफूंदी से भी फसल का बचाव हो
जाता है |
एन्र्थेक्सनोज रोग :- इस रोग
के कारण पत्तियों व फलों पर लाल-काले धब्बे बन जाते हैं जो बाद में परस्पर मिल
जाते हैं यह बीज जनित रोग है बोने से पहले
लौकी के बीज का कुछ देर गौमूत्र या नीम के तेल से उपचार कर लेने से इस रोग की काफी
हद तक रोकथाम हो जाती है |
लौकी की पैदावार :- जनवरी से मार्च तक बोयी फसल से औसतन 80 से 100 कुवंटल तथा जून से जुलाई
में बोयी गयी फसल से औसतन 150 से 200 कुवंटल प्रति एकड़ लौकी के कच्चे फल प्राप्त
हो जाते हैं | तो श्रोतागण ! कीटों व बीमारियों से लौकी फसल को
बचाने के लिए बताये गए इन जैविक उपायों को आजमा कर अवश्य देखिये तथा सार्थक परिणाम
मिलने पर अपने अन्य साथी किसानों को भी प्रेरित कीजिये | किसान भाइयों और बहनों ये थी किसान संचार की ओर से प्रसारित
आज की रेडियो वार्ता “ऐसे करेंलौकी
की जैविक खेती”इसके बारे में आप अपनी प्रतिक्रिया हमारे ईमेल kisansanchar@gmail.com पर भेज
सकते है | आप हमारे youtube channel पर जा कर यह कार्यक्रम और अन्य दूसरे
कार्यक्रम सुन सकते हैं और खेती बाड़ी से जुड़े अन्य रोचक विडियो भी देख सकते हैं | आप facebook.com/kisansanchar
पर जा कर भी हमसे जुड़ सकते हैं या प्रतिक्रिया भेज सकते हैं | आज की इस रेडियो
वार्ता को तैयार करने में सहयोग रहा हमारी टीम
की रूबी,निशा कौशिक और गोपाल सिंह का और इस कार्यक्रम के संपादक थे श्री सुरेन्द्र
सिंह धनखड़ | किसान भाइयों और बहनों अधिक जानकारी के लिए आप हमारे हेल्पलाइन नंबर 09017653200
पर सोमवार से शनिवार सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक फोन करके जानकारी प्राप्त कर
सकते है |
लौकी की जैविक खेती की लेखन
सामग्री भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नयी दिल्ली तथा kisan help.in से प्राप्त की
गयी है जिसके लिए हम इन सभी स्रोतों का आभार प्रकट करते हैं |
किसान भाईयों बहनों व अन्य सुनने वालों को नमस्कार किसान संचार
जीरकपुर चण्डीगढ के कार्यक्रम नई सोच नई खोज में आपका सभी का स्वागत है। श्रोताओं
आज हम आपसे नेगेटिव से फोटो तैयार करने की सरल तकनीक को इस कार्यक्रम में साझा
करेंगे। इस सरल तकनीक को ईजाद करने की कोशिश की है छत्तीसगढ़ के भिलाई में रहने
वाले श्री बी.एस. पाबला जी ने। इनका जन्म दल्ली राज हरा में हुआ था। ये 1981 से महारत्न कंपनी सेल यानि स्टील अथारिटी आॅफ इंडिया लिमिटेड में सेवारत
हैं। इनके पिता जी का नाम श्री केहर सिंह व माता जी का नाम हरभजन कौर है। एक बेटी
रंजीत कौर है।
श्रोताओं ! दशकों पुराने क्लिक थ्री कैमरा वाले नेगेटिव के
फोटो बनाना आज के समय में असंभव सा प्रतीत होता है। लेकिन लगन और चाह के आगे कुछ
भी असंभव नहीं है।अपनी किशोरावस्था से ही कैमरे का शौक रखने वाले बी.एस. पाबला जी
ने ये साबित कर दिया है कि सच्ची लगन और चाह से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। सन 1976
में पाबला जी ने अपना पहला क्लिक थ्री कैमरा खरीदा था। पाबला जी को
अपनी किशोरावस्था से ही क्लिक थ्री कैमरे का शौक है इसलिए जब एक दिन इन्हें 35
से 40 साल पुराने आग्फा कंपनी के क्लिक थ्री
कैमरे के नेगेटिव मिले तो इनके मन में चाह उठी काश ये इन नेगेटिव की फोटो फ्रेम
बनवा लेते और उन्होंने महज 10 मिनट में इसका हल निकाल लिया।
ये सारे नेगेटिव आग्फा कंपनी के क्लिक थ्री कैमरा के थे। ये एक साधारण से लैंस वाला
ऐसा कैमरा था जिसमें अधिक से अधिक 12 चित्र लिए जा सकते थे।
नेगेटिव का आकार 6 बाई 6 सेंटीमीटर का
होता था। एक फोटो लेने के बाद दशकों पुराने क्लिक-3 कैमरा वाले नेगेटिव
के फोटो बनाना आज के समय में असंभव-सा प्रतीत होता है। लेकिन लगन और चाह के आगे कुछ भी असंभव नहीं हैं। जिसे अपनी किशोरावस्था से ही कैमरे का शौक रखने वाले बी.एस. पाबला जी ने साबित कर दिखाया है। बी.एस. पाबला जी ने अपना पहला क्लिक-3 कैमरा सन् 1976 में खरीदा। बी.एस.पाबला जी का जन्म स्थान दल्लीराजहरा
है और ये छत्तीसगढ़ के भिलाई क्षेत्र में रहते हैं और महारत्न कंपनी सेल (Steel Authority of India Limited) में 1981 से सेवारत हैं। पाबला जी के पिता का नाम श्री केहर सिंह और माता जी का नाम हरभजन कौर है। इनकी एक बेटी है जिसका नाम रंजीत कौर है।
पाबला जी को अपनी किशोरावस्था से ही कैमरे का बहुत शौक है, इसलिए जब एक दिन इन्हें 35-40 साल पुराने आग्फा कंपनी के क्लिक-3 कैमरा के नेगेटिव
मिले तो इनके मन में चाह उठी कि काश ये इन नेगेटिव की फोटो फ्रेम बनवा लेते और इन्होंने
महज़ 10 मिनट में इसका हल निकाल लिया। यह सारे नेगेटिव आग्फा कंपनी के
क्लिक-3 कैमरा के थे। यह एक साधारण
से लैंस वाला ऐसा कैमरा था जिसमें अधिक से अधिक 12 चित्र लिए जा सकते थे और नेगेटिव का आकार 6X6 सेंटीमीटर का होता था। एक फोटो लेने के बाद रोल को उंगलियों से घुमाकर ऐसी जगह
लाया जाता था जहां कोरे स्थान पर दूसरी फोटो आ सके। अगर आप रोल घुमाना भूल गए तो एक के ऊपर एक दूसरी फोटो छप जाती थी।इस कैमरे में फ्लैश नहीं था व अलग से लगाया भी जाये तो बड़ी
सी बैटरी बल्ब होता था जो अपनी चकाचैंध राशनी बिखेरने के साथ ही फ्यूज़ हो जाता था
और अगली फ्लैश के लिए नया बल्ब लगाना पड़ता था। उस समय में भी उन्होंने नेगेटिव के फोटो बनाने के लिए फोटो बनाने की तकनीक बताने
वाली एक छोटी सी किताब खरीदी जिसकी सहायता से उन्होंने नेगेटिव से फोटो भी तैयार की। उस फोटो बनाने की तकनीक बताने वाली किताब से उन्होंने नेगेटिव से फोटो बनाने
के लिए कमरे में लाल बल्ब लगाकर डार्क रूम बनाया और डेवलपर, हाइपो व 100 पेपर वाला डिब्बा खरीदा। फिर टेबल लैंप के नीचे ड्राइंग शीट का फ्रेम काट कर रखा। नेगेटिव और फोटो पेपर
साथ-साथ रखकर कुछ सेकेंड की रोशनी दी। फिर जब उन्होंने फोटो पेपर को डेवलपर वाली ट्रे में होले-होले थप-थपाया तो
धीरे-धीरे तस्वीर उभरने लगी। हाइपो से बाहर निकाल कर ठीक से सुखाने
के बाद खिंची तस्वीर सामने आई। उस समय में भी
उन्होंने स्वयं इस प्रकार नेगेटिव से फोटो तैयार की थी।लेकिन अब वे उन दशकों पुराने नेगेटिवों की तस्वीरें उस विधि द्वारा नहीं तैयार
कर सकते थे क्योंकि अब वह सब चीज़ें बाज़ार में उपलब्ध नहीं होती। फिर वे उन नेगेटिवों
को फोटो में तबदील करने के बारे में सोचने लगे। सोचते-सोचते उनकी
ललक इतनी बढ़ गई कि उन्होंने इंटरनेट छाना लेकिन जो उपाय दिखे वह बहुत ही तिकड़मी थे।
फिर उन्होंने यह समस्या फेसबुक पर डॉ. अनिल कूमार को
बताई और डॉ. अनिल कूमार ने उन्हें बताया कि सफेद कागज़ पर नेगेटिव रखकर स्कैनर
पर स्कैन करें और फिर फोटोशॉप जैसे सोफ्ट्वेयर में डाल कर नेगेटिव का पॉजिटिव बना लीजिए।
ये तकनीक पाबला
जी को कुछ जचा नहीं, क्योंकि ऐसी असफल कोशिश वे पहले भी कर चुके थे। फिर पाबला जी
को ख्याल आया कि डाक्टरों के कमरे में एक्सरे में देखे जाने वाले डिब्बे जैसी किसी
चीज़ से कुछ हो सकता है। फिर झट से उन्होंने एक नेगेटिव निकाला और कमप्यूटर मॉनिटर
के सामने स्क्रीन में फंसा दिया। सफेद रोशनी चाहिए थी तहो ब्राउज़र की खाली टेब खोल
ली। लेकिन नीचे का टास्क बार रोड़े अटका रहा था तो उसे ऑटो हाईड कर नीचे जाने दिया।
फिर पाबला जी ने अपना डिजिटल कैमरा उठाया और उस सफेद रोशनी के सामने फंसे नेगेटिव की
फोटो इस प्रकार ली कि सामने फंसे नेगेटिव की फोटो तो आये किन्तु उसके आस-पास की फोटो
न आये। उन्हें एक-दो बार कोशिश करने पर मनचाहा
परिणाम मिल गया। फिर उन्होंने कैमरे के मेमोरी कार्ड से इमेज कमप्यूटर में
डाली और फिर माइक्रोसोफ्ट ऑफिस से काट-छांट कर सही आकार दे दिया। अब इस नेगेटिव जैसी दिखती फोटो को उन्होंने विंडोज़ में उपलब्ध पेंट में खोला, इसके बाद ctrl के साथ a दबाकर या मेन्यू बार में select>select all कर फोटो में ही किसी स्थानपर सावधानी से माउस का राइट क्लिक करके सामने आए बाक्स के निचले
हिस्से में दिए इनवर्ट कलर पर क्लिक किया। अब उनके सामने अच्छी खासी तस्वीर आ चुकी
थी और अब उसे सिर्फ सेव ही करना था। अब यह फोटो फ्रेम में लगाने लायक थी। तो है ना
ये नेगेटिव से फोटो बनाने का नायाब तरीका।
तो किसान
भाईयों बहनों व अन्य श्रोताओं कैसा लगा आपको हमारा नई सोच नई खोज कार्यक्रम । आप
हमें अपने विचार ई मेल के जरिए भेज सकते हैं। हमारा ई मेल पता है Sakshamlive@gmail.com
श्रोताओं अगर
आप फसलों व खेती बाड़ी से जुड़ी जानकारी लेना चाहते हैं तो किसान संचार जीरकपुर
चण्डीगढ़ के कार्यालय में सोमवार से शनिवार सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक फोन
करके बात कर सकते हैं। हमारा टेलीफोन नंबर है 01762-270205 जी हां नंबर एक
बार फिर सुनिए 01762-270205 किसान भाइयों आज के इस कार्यक्रम के संपादक थे श्री
सुरेन्द्र सिंह धनखड़ और सहयोग रहा इनोवेशन टीम की रूबी निशा कौशिक और गोपाल सिंह
का। श्रोताओं अब लेते हैं हम आपसे विदा फिर मिलेंगे आपसे लेकर नया कार्यक्रम नई
जानकारी से जुड़ा। तब तक के लिए नमस्कार
भंडार
गृह में अनाज को सुरक्षित रखे “अनाज/ खाद्य सुरक्षा
चूर्ण”
तो किसान भाइयों और बहनों नमस्कार किसान संचार जीरकपुर निकट
चंडीगढ़ की टीम आज आपके लिए लेकर आयीहै
रेडियो वार्ता भंडार गृह में अनाज को सुरक्षित रखे “अनाज /खाद्य सुरक्षा चूर्ण”आज हम आपको किसान संचार जीरकपुर निकट
चंडीगढ़ के सौजन्य से
यह बताने का प्रयास कर रहे है | कि किस प्रकार आप रसायनों के बजाय जैविक तरीके से
अपने भंडार गृह में रखे अनाज को सुरसरी (घुन) आदि कीड़ों से सुरक्षित रख सकते हैं |
साथियों ! आप सब जानते ही हैं कि भंडार गृहों में यहाँ तक
कि घरों के भीतर भी अनाज को सुरसरी (घुन) आदि कीड़ों से बचाने के लिए अचूक इलाज के
रूप में सैल्फास नामक अत्यंत जहरीले व तुरंत प्रभावी रसायन का उपयोग बहुतायत में
किया जा रहा है | इस खतरनाक रसायन की बिक्री व उपयोग विषय विशेषज्ञों के
मार्गदर्शन में ही मान्य है किन्तु व्यवहारिक रूप में इस नियम की लगातार अनदेखी की
जा रही है | जिसका परिणाम यह है कि हर वर्ष किन्ही कारणों से निराश व हताश अनेक
युवक-युवतियां इसी सर्व सुलभ सैल्फास नामक जहर को खाकर आत्म हत्या कर रहे हैं | यह
इतना भयानक व तेजी से असर करने वाला जहर है | जिसे खाते ही यदि चिकित्सा सुविधा न
मिले तो इसे खाने वाले की मृत्यु निश्चित है |
श्रोतागण ! हमारे देश में यह मान्यता रही है | कि जब जब भी
प्रकृति हमसे नाराज हुई है अर्थात अकाल या कोई महामारी जैसी विपदा आयी है | तब-तब
प्राकृतिक वातावरण को शुध्द करने के लिए हमारे देश में जगह -जगह सामूहिक रूप से हवन/यज्ञ किये जाते रहे हैं | इन हवनों की भस्म को खेतों व जल स्त्रोतों में
भी शुद्धि के लिए डालने की परम्परा रही है | इस भस्म को चिकित्सीय गुणों
के कारण लोग अपने शरीर पर मलते है | तथा दवाई के रूप में खाते भी हैं | नीम के
वृक्षों की उपस्थिति मात्र को भी लोग पयार्वरण शुद्धि का साधन मानते हैं नीम के
चिकित्सीय गुणों के कारण ही नीम के
विभिन्न भागों के नित्य उपयोग से तो आप सब भी खूब परिचित है और किसी न किसी रूप
में इसका उपयोग करते ही रहते हैं | तो साथियों ! हम आपसे अनुरोध करेंगे | कि भंडार
में अनाज को कीड़ों से सुरक्षित रखने हेतु नीम की निम्बोली तथा हवन की भस्म से
निर्मित “अनाज/खाद्य सुरक्षा चूर्ण” को
जरुर आजमा कर देखिये |
तो लीजिए अनाज को सुरक्षित रखने वाले इस खाद्य सुरक्षा
चूर्ण को स्वंय तैयार करके उपयोग करने की विधि इस प्रकार बतायी जा रही है |
आवश्यक सामग्री :- बकैन (बकायन ) या नीम की सूखी निम्बोली 2.5 किलोग्राम तथा
अग्नि होत्र (हवनकुण्ड ) की भस्म 2.5 किलोग्राम |
बनाने की विधि :- नीम की सूखी निम्बोलियों को कूटकर बारीक कर लें तथा
इसमें हवन की भस्म को अच्छी तरह मिला लें |
तो लीजिए अब यह 5 किलोग्राम खाद्य सुरक्षा चूर्ण उपयोग के
लिए तैयार है |
प्रयोग की विधि :- यह सुनिश्चित कर लें | कि भंडार गृह में रखे जाने वाले
अनाज में नमी 8 प्रतिशत से अधिक न हो | यह भी ध्यान रखे कि एक कुवंटल अनाज के लिए
500 ग्राम खाद्य सुरक्षा चूर्ण उपयोग में लाना है | अब सबसे पहले थोडा चूर्ण
भण्डारण टंकी के तले पर बिखेरे फिर अनाज की 8 से 10 परत इस तरह लगायें कि हर परत
के बाद इस खाद्य सुरक्षा चूर्ण का बुरकाव होना चाहिए | अन्त में सबसे ऊपरी परत पर
इस खाद्य चूर्ण को छिड़ककर अनाज के भंडार या टंकी को इस तरह से बंद कर लें ताकि
उसमें वायु संचार न हो सके | ऐसा करके आप देखेंगे कि इस चूर्ण के साथ भंडारित अनाज
में एक वर्ष तक कोई भी कीड़ा हानि नही पहुंचाता | क्योंकि इस भस्म रूपी कीट नाशक
में किसी भी प्रकार का कोई रसायन नही होता इसलिए यह पूरी तरह जैविक होने के कारण हमारे अनाज की
गुणवत्ता को उसके वास्तविक रूप में बनाये रखता है इस प्रकार हमारे स्वास्थय को ठीक
रखने के साथ-साथ पर्यावरण पर भी इसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है | तो फिर क्यों न हम
अभी से इस जैविक कीटनाशी का उपयोग करके जैविक खेती रूपी मंजिल की ओर एक और कदम
बढायें |
तो किसान भाइयों और बहनों
ये थी किसान संचार जीरकपुर निकट चंडीगढ़ की और से प्रसारितआज की रेडियो वार्ता | भंडार गृह में अनाज को सुरक्षित
रखे “अनाज/खाद्य सुरक्षा
चूर्ण इसके बारे में आप अपनी प्रतिक्रिया हमारे ईमेल पता है kisansanchar@gmail.com जी हा आज की इस रेडियो वार्ता को तैयार करने
में सहयोग रहा टीम की रूबी,निशा कौशिक और गोपाल सिंह का और इस कार्यक्रम के
संपादक थे श्री सुरेन्द्र सिंह धनखड़ अधिक जानकारी के लिए आप हमारे हेल्पलाइन नंबर
9017653200
पर सोमवार से शनिवार सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक फोन करके बात कर सकते हैं।
धन्यवाद |