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Saturday, December 3, 2016

कैसे करें अदरक की उन्नत खेती

अदरक भारत की एक नकदी फसल है | विश्व के कुल उत्पादन का 60 प्रतिशत पैदावार भारत में होता है एवं विदेशों को निर्यात करके काफी विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है भारत में लगभग 37000 हैक्टेयर भूमि पर उगाकर 54000 टन शुद्द उत्पादन प्राप्त होता है भारत के कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत भाग उत्पादित किया जाता है | अदरक को मसाले के रूप में प्रयोग करने के अतिरिक्त सुखाकर सोठ बनाया जाता है जिसका काफी औषधीय महत्व है | इसे अचार,मुरब्बा,चटनी के रूप में प्रयोग किया जाता है |
फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है उन्नत किस्मों का चयन करके सघन कृषि पद्धतियों को अपनाया जाये |
रामोड़ीजनीरो :- यह ब्राजील की प्रजाति है जिसकी भारतीय जलवायु से सर्वाधिक उपज पायी गयी है |
चाइना :- यह चीन से लाई गई प्रजाति है जिसकी उपज 200-250 किवंटल प्रति हैक्टेयर है सोठ बनाने हेतु उत्तम प्रजाति है |
वरुआ सागर :- यह उत्तर प्रदेश में झाँसी की यह किस्म है इस प्रजाति की उपज 140-150 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है |
1.सुप्रभा 2.सुरुचि 3.सुरभी इन किस्मों की पैदावार 250-300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर पाई गई है तथा सौंठ बनाने के सभी किस्में उपयुक्त है |
भूमि एवं जलवायु :- सामान्यतया अदरक की खेती उन सभी प्रकार की भूमि पर की जा सकती है जहाँ पर जल भराव की समस्या न हो परन्तु अच्छी उपज के लिए उत्तम जल निकास वाली जीवांश युक्त दोमट अथवा बलुई दोमट भूमि उत्तम है
खेत की तैयारी :- भूमि की तैयारी के लिए 2-3 बार गहरी जुताई आवश्यक है इसके लिए प्रथम जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करने के बाद 2 जुलाई देशी हल से करना चाहिए | प्रत्येक जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए |
खाद एवं उर्वरक तथा प्रयोग विधि :- अदरक की खेती हेतु अधिक जीवांश युक्त भूमि की आवश्यकता होती है अत: 250-300 क्विंटल अच्छी पकी गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट खाद का प्रयोग प्रति हैक्टेयर करना चाहिए | प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ है कि रासायनिक खाद के रूप में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन 50 किलोग्राम फास्फोरस एवं 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना लाभप्रद है |
बुवाई का समय:- फसल से भरपूर पैदावार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि बुवाई समय पर की जाए | बुवाई के समय का कन्दो के अंकुरण पर सीधा प्रभाव पड़ता है | अदरक की बुवाई का उचित समय अप्रैल से जून तक माह माना जाता है अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बुवाई मई माह में तथा मैदानी क्षेत्रों में जून माह में करनी चाहिए | जिससे तेज धूप से बीज को बचाया जा सके बुवाई के समय लाईन से लाईन की दूरी 45 सेटीमीटर तथा कन्दों की बुवाई करना चाहिए |
बीज का उपचार:- भवाई से पूर्व बीज को 1 ग्राम बाविस्टीन व थाइरम के 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए |
बुवाई की विधि:- चयनित एवं उपचारित कन्दों को लाईन से बोने के बाद मिटटी में अच्छी तरह ढक देना चाहिए व गोबर की अच्छी पकी खाद की एक या घास व् पत्तियों की तह से ढक देना चाहिए | ऐसा करने से कोमल अंकुरों को निकलते समय कोई नुकसान नहीं होता व अंकुरण जल्दी तथा अच्छी प्रकार से होता है |
मलिंच्ग:- बुवाई के तुरंत बाद हरी पत्तियों,पुआल,भूसा या कम्पोस्ट खाद आदि का प्रयोग करना चाहिए | इससे जमीन की उपरी सतह ढक जाती है इससे खेत में नमी बनी रहती है तथा अंकुरण शीघ्र होता है तथा फसल की प्रारम्भिक अवस्था में सिंचाई की कम आवश्यकता पडती है |
सिंचाई:- वर्षा ऋतु में प्राय: सिंचाई की आवश्यकता नहीं पडती है क्योंकि समय-समय पर वर्षा होती रहती है यदि समय पर वर्षा नहीं होती है | तो आवश्यकता सिंचाई कार देनी चाहिए | सर्दियों में फसल की स्थिति के अनुसार 10-15 दिन पर सिंचाई कर देनी चाहिए |
रोग,कीट व उपचार :- कन्द का सड़ना :- यह रोग मुख्य रोग से फूजेरियम ऑक्सीस्पोरम के कारण होता है इसमें नीचे की पत्तियां पीली पड़ जाती है बाद में सम्पूर्ण पौध पीला पड़ जाती है बाद में सम्पूर्ण पौध पीला पड़कर मुरझा जाता है भूमि के पास का भाग पनीला एवं मुलायम हो जाता है |
रोकथाम :- 1 रोगग्रस्त भूमि से बीज नहीं लेना चाहिए |
2.बीज को बुवाई से पूर्व डाईथेन एम.-45 दवा की के घोल से एक घंटे तक उपचारित करने के बाद छायां में अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए |
कीट:- तना छेदक:- यह कीट तना को छेदकर उसका रस चूसता है | जिससे पौधा कमजोर पड़ जाता 
है और अन्त में सूख जाता है |
रोकथाम :- इस कीट की रोकथाम के लिए रोगोर नामक कीटनाशक दवा का 0.1 प्रतिशत का घोल दो माह के अन्तराल परर छिड़काव करने से इस कीट को नियंत्रित किया जा सकता है |

अदरक की उन्नत खेती की जानकारी के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए विडियो के लिंक पर क्लिक करें |

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